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Tuesday, 16 August 2011

अब तक छह मंत्री और 400 अफसरों को हटवा चुके हैं 'अन्ना'

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की लड़ाई की वजह से अभी तक महाराष्ट्र के 6 मंत्री और 400 अफसरों को पद से हटना पड़ा है। आजीवन अविवाहित रहने का प्रण कर चुके अन्ना कभी देश के लिए लड़ते थे।
वे कहते हैं कि परिवार होने से समाज के प्रति जिम्मेदारी बंट जाती इसलिए मैंने शादी नहीं की। रालेगांवसिद्धि की 2200 एकड़ भूमि में से तब केवल 80 एकड़ सिंचित थी। वहां औसतन 300 मिमी वर्षा होती थी जो अच्छी फसल के लिए पर्याप्त नहीं थी।
गांव के आसपास 40 शराब की दुकानें थी। लोग 30-35 किलोमीटर दूर मजदूरी करने जाते और सारी कमाई शराब पर लुटा देते। कभी मुंबई में फूल बेचकर आजीविका कमाने वाले अन्ना ने पानी बचाने का आंदोलन चलाया और शराब बंदी का भी। आज उनके गांव से मजदूरी करने कोई बाहर नहीं जाता। इस गांव में अब फलों की भरपूर पैदावार होती है। लोग न तो शराब पीते हैं और न ही सिनेमा देखते हैं। उनके सहयोगी कहते हैं कि हम शराब और सिनेमा पर समय और पैसा क्यों बर्बाद करें।
गांव को ठीक करने के बाद उनका ध्यान समाज पर गया। उन्होंने 1991 में भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन की नींव रखी। उन्होंने 42 वन अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत पेश किए। सरकार को कार्रवाई न करते देख उन्होंने राजीव गांधी सरकार द्वारा दिया गया वृक्षमित्र और पद्मश्री पुरस्कार वापस कर दिए। सरकार झुकी और अफसरों को हटाया गया।
1995 में उन्होंने शिवसेना-भाजपा सरकार के तीन मंत्रियों शशिकांत सुतार,महादेव शिवांकर और बबन घोलाप के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के आरोप लगाते हुए भूख हड़ताल की। कई खोखले वादों के और बार-बार उपवास करने के बाद सरकार ने 1996 में दो मंत्रियों सुतार और शिवांकर को हटाया।
2003 में कांग्रेस-एनसीपी सरकार के दौरान चार कथित मंत्रियों-सुरेशदादा जैन,नवाब मलिक,विजयकुमार गावित और पद्मसिंह पाटील पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उन्हें बर्खास्त किए जाने की मांग को लेकर उन्होंने आमरण अनशन किया। राज्य सरकार ने जांच आयोग बनाया। अभियोग के बाद जैन और मलिक को इस्तीफा देना पड़ा।

हजारे ने वर्ष 2000 में ‘महाराष्ट्र सूचना का अधिकार कानून’ बनवाने को राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए मुहिम चलाई। इसके लिए 12000 किलोमीटर पद यात्रा की और 13 दिन तक अनशन किया। आखिरकार राज्य सरकार को इस संबंध में कानून बनाना पड़ा। यही 2005 में केंद्र सरकार द्वारा पारित ‘सूचना का अधिकार कानून’ का आधार बना।

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